By: The Trek News Desk
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और हाल ही में हुए युद्धविराम समझौते के बाद अमेरिका और ईरान के बीच स्विट्जरलैंड में महत्वपूर्ण वार्ता शुरू हो गई है. हालांकि बातचीत के दौरान भी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर दबाव बनाए रखते हुए कड़े संकेत दिए हैं, जिससे वार्ता का माहौल और संवेदनशील हो गया है.
दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडल युद्धविराम को स्थायी रूप देने और क्षेत्रीय स्थिरता बहाल करने के मकसद से बातचीत कर रहे हैं. अमेरिकी पक्ष चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर दीर्घकालिक वार्ता प्रक्रिया में बना रहे. अमेरिका का दावा है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम सैन्य उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, जबकि तेहरान लगातार इन आरोपों को ख़ारिज करता रहा है.
अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस कर रहे हैं. उनके साथ वरिष्ठ सलाहकार जारेड कुशनर और विशेष दूत स्टीव विटकॉफ भी मौजूद हैं. दूसरी ओर, ईरानी टीम की कमान संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर ग़ालीबाफ़ और विदेश मंत्री अब्बास अराघची संभाल रहे हैं.
इस वार्ता में क़तर और पाकिस्तान मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं, जो दोनों पक्षों के बीच सहमति बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
बातचीत शुरू होने से पहले ईरान ने दावा किया कि उसने एक बार फिर स्ट्रेट ऑफ होरमुज़ को बंद कर दिया है. ईरान का कहना है कि लेबनान में इसराइल की सैन्य कार्रवाई और हिज़्बुल्लाह से जुड़े घटनाक्रमों को वार्ता का हिस्सा बनाया जाना चाहिए.
हालांकि अमेरिका ने कहा है कि महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर जहाज़ों की आवाज़ाही जारी है. ट्रंप ने चेतावनी दी है कि यदि 60 दिनों के भीतर कोई अंतिम समझौता नहीं होता है, तो अमेरिका इस जलमार्ग से गुज़रने वाले जहाज़ों पर शुल्क लगाने जैसे कदमों पर विचार कर सकता है.
अमेरिका और ईरान के बीच जारी अनिश्चितता का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी दिखाई दिया. होरमुज़ दुनिया में तेल और प्राकृतिक गैस आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता है.
रविवार को अमेरिकी कच्चे तेल (WTI) की कीमत लगभग 3 प्रतिशत बढ़कर 78.70 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई. वहीं अंतरराष्ट्रीय मानक ब्रेंट क्रूड की कीमत 1 प्रतिशत से अधिक बढ़कर 81.70 डॉलर प्रति बैरल दर्ज की गई.
ईरानी प्रतिनिधिमंडल से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, बातचीत में केवल लेबनान की स्थिति ही नहीं बल्कि आर्थिक विषयों पर भी चर्चा हुई. इसमें विदेशों में जमे ईरानी फंड्स को जारी कराने और ईरान के तेल निर्यात से जुड़े मुद्दे शामिल रहे.
विशेषज्ञों का कहना है कि वार्ता की सबसे बड़ी चुनौती ईरान का परमाणु कार्यक्रम ही बना हुआ है. अमेरिका इस पर अधिक पारदर्शिता और निगरानी चाहता है, जबकि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह शांतिपूर्ण बताता है.
Source: News Agencies

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