By: The Trek News Desk
सर्दियों की शुरुआत के साथ ही उत्तर भारत के कई शहरों में हवा फिर से सांस लेने लायक नहीं रही. हर तरफ “AQI” यानी Air Quality Index की चर्चा है, जो बताता है कि हम जिस हवा में सांस ले रहे हैं, वह कितनी साफ़ या कितनी प्रदूषित है.
लेकिन सवाल यह है कि यह सूचकांक आखिर होता क्या है, इसे कैसे मापा जाता है, और यह हमारे शरीर के लिए कितना खतरनाक साबित हो सकता है? आइए विस्तार से समझते हैं.
वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) क्या है
वायु गुणवत्ता सूचकांक (Air Quality Index) हवा में मौजूद प्रदूषक तत्वों की मात्रा को एक एकीकृत आंकड़े में बदलकर बताने की प्रणाली है. इसका उद्देश्य आम लोगों को यह समझाना है कि किसी क्षेत्र की हवा “स्वस्थ”, “खराब” या “घातक” श्रेणी में आती है या नहीं.
भारत में यह सूचकांक केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) द्वारा तैयार किया जाता है. इसके लिए देशभर के सैकड़ों मॉनिटरिंग स्टेशनों से डेटा एकत्र किया जाता है.

AQI कैसे मापा जाता है
AQI की गणना हवा में मौजूद छह प्रमुख प्रदूषकों के स्तर से की जाती है –
- PM2.5 (सूक्ष्म कण जो फेफड़ों में गहराई तक पहुंचते हैं)
- PM10 (मोटे धूलकण)
- नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO₂)
- सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂)
- कार्बन मोनोऑक्साइड (CO)
- ओज़ोन (O₃)
इन सभी गैसों और कणों की 24 घंटे की औसत मात्रा निकाली जाती है. फिर जो प्रदूषक सबसे अधिक खतरनाक स्तर पर होता है, वह दिन का अंतिम AQI निर्धारित करता है.
AQI की श्रेणियाँ और उनके प्रभाव

प्रदूषित हवा के स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव
लगातार प्रदूषित हवा में रहना शरीर के लगभग हर अंग पर असर डालता है.
- फेफड़ों की कार्यक्षमता घटती है, खासकर बच्चों और बुजुर्गों में.
- हृदय रोग, स्ट्रोक और अस्थमा जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ता है.
- त्वचा और आंखों में जलन और एलर्जी होती है.
- गर्भवती महिलाओं में शिशु के विकास पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, भारत में हर साल लगभग 10 लाख से अधिक मौतें वायु प्रदूषण से जुड़ी बीमारियों के कारण होती हैं.
भारत के सबसे प्रदूषित शहर
2025 में जारी नवीनतम रिपोर्टों के अनुसार, दिल्ली एक बार फिर भारत का सबसे प्रदूषित महानगर बना हुआ है. इसके अलावा गाजियाबाद, भिवाड़ी, फरीदाबाद, लखनऊ और नोएडा जैसे शहर भी लगातार ‘बहुत खराब’ या ‘गंभीर’ श्रेणी में बने हुए हैं.
सर्दियों के दौरान पराली जलाने, वाहनों के धुएं, औद्योगिक उत्सर्जन और निर्माण स्थलों की धूल प्रदूषण के मुख्य स्रोत बने रहते हैं.
सबसे स्वच्छ हवा वाले शहर
भारत में कुछ शहर अब भी अपेक्षाकृत स्वच्छ हवा के लिए मिसाल बने हुए हैं.
मैसूर (कर्नाटक), कोट्टायम (केरल), शिलॉन्ग (मेघालय) और अमरावती (महाराष्ट्र) जैसे शहरों का औसत AQI अक्सर 50 से नीचे रहता है.
इन शहरों में हरियाली, कम वाहन दबाव और औद्योगिक गतिविधियों की सीमितता प्रमुख कारण हैं.
विश्व परिदृश्य
वैश्विक स्तर पर लाहौर (पाकिस्तान) और ढाका (बांग्लादेश) दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में गिने जाते हैं, जबकि हेलसिंकी (फिनलैंड), और ऑस्लो (नॉर्वे) सबसे स्वच्छ हवा वाले शहरों की सूची में शामिल हैं.
नोट: (यह आंकड़े लाइव डेटा के अनुसार हैं, और यह बदलते रहते हैं)


समाधान की दिशा में कदम
वायु प्रदूषण को नियंत्रित करना केवल सरकार की नहीं, बल्कि हर नागरिक की जिम्मेदारी है.
- सार्वजनिक परिवहन और इलेक्ट्रिक वाहनों का प्रयोग बढ़ाना
- निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण उपाय लागू करना
- पराली और कचरा जलाने पर सख्ती
- शहरों में ग्रीन बेल्ट और वृक्षारोपण को प्रोत्साहन देना
- व्यक्तिगत स्तर पर मास्क, एयर प्यूरीफायर और इनडोर पौधों का उपयोग
AQI सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि हमारी सांसों की सेहत का आईना है.
अगर हम आज प्रदूषण को गंभीरता से नहीं लेंगे, तो आने वाले वर्षों में यह स्वास्थ्य संकट और गहरा होगा.
शुद्ध हवा अब एक अधिकार नहीं, बल्कि एक संघर्ष बन चुकी है, और इसे बचाने की शुरुआत हर व्यक्ति के स्तर से ही होगी.
Source: News Agencies
