इस्तांबुल में अफगानिस्तान–पाकिस्तान वार्ता: सीमा पर संघर्ष के बीच स्थायी संघर्षविराम की कोशिश

By: The Trek News Desk

अफगानिस्तान और पाकिस्तान के प्रतिनिधि शनिवार को इस्तांबुल में आमने-सामने बैठने जा रहे हैं ताकि हाल के खूनी संघर्ष के बाद सीमा क्षेत्र में स्थायी शांति और सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की जा सके. यह बैठक दो सप्ताह पहले शुरू हुई झड़पों के बाद हो रही है, जिनमें दर्जनों सैनिकों और नागरिकों की मौत हुई थी.

दो सप्ताह पहले भड़का था संघर्ष

यह तनाव उस समय शुरू हुआ जब क़ाबुल में हुए कई धमाकों के लिए तालिबान सरकार ने पाकिस्तान को ज़िम्मेदार ठहराया और जवाबी कार्रवाई में सीमा पर हमला किया.
इसके जवाब में इस्लामाबाद ने “सटीक हवाई हमलों” (precision strikes) की पुष्टि करते हुए दावा किया कि उसने अफगानिस्तान में मौजूद सशस्त्र समूहों पर निशाना साधा, जो पाकिस्तान की सुरक्षा के लिए खतरा माने जाते हैं.

लगातार झड़पों के बाद दोनों देशों ने 48 घंटे का संघर्षविराम घोषित किया था, जो मात्र दो दिन में ही टूट गया. इसके बाद क़तर और तुर्की की मध्यस्थता में दोहा में दूसरी बार अस्थायी शांति समझौता हुआ, जो अब तक कायम है, हालांकि इसके प्रावधानों का खुलासा नहीं किया गया है.

इस्तांबुल में ‘स्थायी व्यवस्था’ पर चर्चा

शनिवार को होने वाली इस बैठक में दोनों पक्ष उन “सुरक्षा तंत्रों (mechanisms)” पर चर्चा करेंगे जिनकी रूपरेखा दोहा वार्ता में तय की गई थी.
अफगान प्रतिनिधिमंडल, जिसकी अगुवाई उप गृह मंत्री हाजी नजीब कर रहे हैं, शुक्रवार को ही तुर्की के लिए रवाना हो चुका है. पाकिस्तान ने अभी तक अपने प्रतिनिधियों के नाम सार्वजनिक नहीं किए हैं.

तालिबान प्रशासन का मुख्य उद्देश्य अफगानिस्तान की क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करना है, जबकि पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर हुसैन अंद्राबी ने कहा कि वार्ता का फोकस “अफगान ज़मीन से फैल रहे आतंकवाद के खतरे” पर रहेगा.

सुरक्षा विवादों की जड़ में पुराना अविश्वास

इस्लामाबाद का आरोप है कि तालिबान शासन पाकिस्तानी तालिबान (TTP) को पनाह दे रहा है, जो पाकिस्तान में हमलों के लिए ज़िम्मेदार है. काबुल इन आरोपों से इंकार करता है.
अंतरराष्ट्रीय संकट समूह (ICG) के अफगानिस्तान विश्लेषक इब्राहीम बहिस के अनुसार,

“इस्तांबुल की बैठक बेहद अहम है क्योंकि यही वह मंच होगा जहां पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच सहयोग का ‘तकनीकी ढांचा’ तय किया जाएगा.”

उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच सूचना व खुफिया साझेदारी जैसे उपायों पर विचार किया जा सकता है.

“उदाहरण के लिए, यदि पाकिस्तान को किसी क्षेत्र में TTP की मौजूदगी का संदेह है, तो वह समन्वय के तहत अफगान पक्ष को जानकारी देगा ताकि वे खुद कार्रवाई कर सकें, बजाय हवाई हमलों के,” उन्होंने बताया.

हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि केवल तकनीकी समझौते से वर्षों पुराने अविश्वास की समस्या खत्म नहीं होगी.

भारत यात्रा के दौरान बढ़ा तनाव

ध्यान देने योग्य बात यह है कि काबुल में हुए विस्फोट उस समय हुए जब तालिबान का विदेश मंत्री पहली बार भारत की यात्रा पर था. विश्लेषकों का मानना है कि यह भी दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ने का एक अप्रत्यक्ष कारण बन सकता है.

तुर्की और क़तर की मध्यस्थता जारी

तुर्की ने बैठक की तारीख या स्थान की पुष्टि नहीं की है, परंतु उसने दोहा में दोनों देशों के बीच हुई सहमति का स्वागत करते हुए कहा है कि वह “क्षेत्र में स्थायी शांति और स्थिरता के प्रयासों का समर्थन जारी रखेगा.”

Source: News Agencies

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *