By: The Trek News Desk
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (16 फरवरी, 2026) को असम के मुख्यमंत्री के खिलाफ कथित ‘हेट स्पीच’ को लेकर आपराधिक जांच की मांग वाली याचिकाओं पर सीधे सुनवाई करने से इनकार कर दिया. अदालत ने कहा कि इन मामलों में हस्तक्षेप करने का कोई ठोस कारण नहीं दिखता और याचिकाकर्ताओं को संबंधित हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना चाहिए.
तीन जजों की पीठ, जिसकी अध्यक्षता भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत कर रहे थे, ने याचिकाकर्ताओं को गुवाहाटी हाई कोर्ट में याचिका दायर करने की सलाह दी. याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि असम के मुख्यमंत्री राज्य में प्रभावशाली पद पर हैं, इसलिए निष्पक्ष जांच की आशंका है, लेकिन अदालत ने हाईकोर्ट की शक्तियों पर भरोसा जताया.
याचिकाएं हिंमता बिस्वा सरमा के खिलाफ दायर की गई थीं, जिन पर आरोप है कि उन्होंने कथित तौर पर सांप्रदायिक भाषण दिए और एक सोशल मीडिया पोस्ट साझा की, जिसमें उन्हें दो मुस्लिम पुरुषों के एनिमेटेड चित्र की ओर हथियार चलाते हुए दिखाया गया था. यह पोस्ट बाद में हटा दी गई, लेकिन याचिकाकर्ताओं का कहना है कि वीडियो अन्य प्लेटफॉर्म पर प्रसारित होता रहा.
इन याचिकाओं को लेफ्ट पार्टियों सहित अन्य पक्षों ने दायर किया. वरिष्ठ अधिवक्ताओं ए.एम. सिंहवी, सी.यू. सिंह और अधिवक्ता निज़ाम पाशा की ओर से अदालत में कहा गया कि मुख्यमंत्री ने अपने पद पर रहते हुए ऐसे भाषण दिए, जो कथित तौर पर मुस्लिम समुदाय के खिलाफ शत्रुता को बढ़ावा देते हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि यह टिप्पणी की कि कोई भी राजनीतिक नेता या संवैधानिक पदाधिकारी ऐसा आचरण नहीं कर सकता, जिससे संविधान में निहित धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को ठेस पहुंचे, खासकर चुनावों के समय. बावजूद इसके, अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट के व्यापक अधिकारों को नज़रअंदाज़ कर सीधे सर्वोच्च न्यायालय आना सही नहीं है.
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि “हर मामला” सीधे सुप्रीम कोर्ट में लाया जा रहा है, जबकि हाईकोर्ट भी समान अधिकार रखता है. उन्होंने साफ किया कि जो शक्तियां सुप्रीम कोर्ट के पास हैं, वे हाईकोर्ट के पास भी मौजूद हैं.
याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि मामला सामान्य नहीं, बल्कि एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से जुड़ा है और अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट सीधे हस्तक्षेप कर सकता है. इस पर अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट को दरकिनार करना न्यायिक व्यवस्था के लिए निरुत्साहित करने वाला होगा.
सुप्रीम कोर्ट ने गुवाहाटी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया कि यदि याचिका वहां दायर की जाती है तो उस पर शीघ्र सुनवाई सुनिश्चित की जाए. साथ ही, अदालत ने याचिकाकर्ताओं से न्यायिक प्रणाली पर विश्वास बनाए रखने की अपील की.
यह मामला अब असम में राजनीतिक और कानूनी बहस का केंद्र बन गया है, जहां एक ओर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राजनीतिक भाषण की सीमा पर सवाल उठ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सांप्रदायिक सौहार्द और संवैधानिक मर्यादाओं को लेकर चर्चा तेज़ हो गई है.
Source: News Agencies

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