By: The Trek News Desk
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को स्पष्ट कर दिया कि विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) प्रक्रिया के दौरान बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) पर बढ़ते दबाव के बावजूद, मतदाता सूची संशोधन का यह अहम चरण किसी भी हालत में प्रभावित नहीं होना चाहिए. अदालत ने कहा कि बीएलओ की दिक्कतों को दूर करना और आवश्यक मानव-बल उपलब्ध कराना राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है.
राज्य चाहें तो अतिरिक्त कर्मचारी नियुक्त करें
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमल्य बागची की पीठ ने कहा कि राज्य सरकारें या तो बोझ से दबे कर्मचारियों को बदलें या बीएलओ की मदद के लिए अतिरिक्त स्टाफ भेजें. अदालत का जोर था कि बीएलओ, जो राज्य के कर्मचारी हैं. उनके ऊपर निर्धारित वैधानिक कर्तव्यों का पालन करना अनिवार्य है.
व्यक्तिगत कठिनाइयों को ध्यान में रखकर छूट दी जा सकती है
पीठ ने निर्देश दिया कि यदि किसी बीएलओ को व्यक्तिगत या स्वास्थ्य संबंधी कठिनाई है, तो राज्य सरकार उनके मामले पर व्यक्तिगत आधार पर विचार कर सकती है और आवश्यकता हो तो उन्हें बदला भी जा सकता है.
चुनाव आयोग ने कहा- काम का दबाव ‘कल्पना’ है
चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने तर्क दिया कि बीएलओ के अत्यधिक दबाव में होने की बातें “कल्पना मात्र” हैं. उन्होंने बताया कि
- हर बूथ पर 1200 वोटरों की सीमा तय है,
- बीएलओ को 37 दिन (4 नवंबर से 11 दिसंबर) का समय दिया गया है,
- और तमिलनाडु व उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में 85–90% फॉर्म पहले ही वितरित किए जा चुके हैं.

याचिकाकर्ताओं का तर्क- बीएलओ की स्थिति गंभीर
वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने अदालत से कहा कि बीएलओ की समस्याएँ वास्तविक हैं और उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
उन्होंने सवाल उठाया, “जब चुनाव 2027 में है, तो दो महीने में SIR पूरा करने की इतनी जल्दी क्यों?”
उन्होंने यह भी कहा कि बीएलओ द्वारा अपलोड किए गए फॉर्म की गुणवत्ता की जांच कौन करेगा, और चुनाव आयोग के दावों को आंखें बंद करके नहीं माना जा सकता.
FIR, दंड की धमकियों और आत्महत्या के मामलों पर चिंता
तमिलागा वेत्त्रि कज़गम की ओर से वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने कोर्ट को बताया कि बीएलओ, जो अक्सर आंगनवाड़ी कार्यकर्ता या प्राथमिक शिक्षक होते हैं, उनको लक्ष्य पूरा न करने पर
- जेल की धमकी,
- अनुशासनात्मक कार्रवाई,
- और सेवा समाप्ति
तक की चेतावनी दी जा रही है.
उन्होंने दावा किया कि
- 50 FIR Representation of the People Act, 1950 की धारा 32 के तहत दर्ज की गई हैं,
- और देश में करीब 30 बीएलओ ने आत्महत्या की है.
उन्होंने कोर्ट से आग्रह किया कि चुनाव आयोग को बीएलओ के खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज करने से रोका जाए और बताया कि बीएलओ भले ही राज्य कर्मचारी हों, लेकिन काम तो चुनाव आयोग का ही कर रहे हैं, इसलिए आयोग का रवैया संवेदनशील होना चाहिए.
अदालत ने कहा, चुनाव आयोग नहीं, राज्य जिम्मेदार
सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे का केंद्र चुनाव आयोग से हटाकर राज्यों की ओर मोड़ते हुए कहा कि बीएलओ राज्य के कर्मचारी हैं, इसलिए यह राज्यों की जिम्मेदारी है कि वे किन-किन लोगों को इस काम में लगाते हैं और किन्हें छूट दी जा सकती है.
मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “काम रुक नहीं सकता. किसी न किसी को यह करना होगा… यह उनका दायित्व है. जैसे अधिकारी चुनाव कराने के लिए एक राज्य से दूसरे राज्य तक जाते हैं, वैसे ही SIR भी समय पर पूरा होना चाहिए.”
Source: News Agencies
