By: प्रेरणा भारती
राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ के 150 वर्ष पूर्ण होने पर मेरठ कॉलेज के ऐतिहासिक सभागार में बुधवार को एक भव्य और विशाल कार्यक्रम का आयोजन किया गया. कार्यक्रम में करीब 500 छात्रों, शिक्षकों और गणमान्य व्यक्तियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया. आयोजन की अध्यक्षता कॉलेज की प्राचार्य प्रो. सीमा पंवार ने की, जबकि मुख्य अतिथि एवं वक्ता चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के इतिहास विभागाध्यक्ष प्रो. विघ्नेश कुमार त्यागी रहे.
कार्यक्रम की शुरुआत मां सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण और दीप प्रज्वलन से हुई. दीप प्रज्वलन प्रो. विघ्नेश कुमार त्यागी, प्रो. वाचस्पति मिश्रा, प्रो. कपिल सीवॉच और प्रो. सीमा पंवार ने संयुक्त रूप से किया. मुख्य अतिथि का स्वागत प्रो. कपिल सीवॉच, प्रो. नीलम पंवार और प्रो. चंद्रशेखर भारद्वाज ने पुष्पगुच्छ भेंट करके किया.
अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. सीमा पंवार ने कहा, “वंदे मातरम का उद्घोष भारत की आत्मा का प्रतीक है. यह गीत केवल एक रचना नहीं, बल्कि राष्ट्र की एकता, स्वतंत्रता और आत्मसम्मान का जीवंत प्रतीक है.”

मुख्य वक्ता प्रो. विघ्नेश कुमार त्यागी ने अपने व्याख्यान में ‘वंदे मातरम’ के ऐतिहासिक और राष्ट्रीय महत्व पर गहन प्रकाश डाला. उन्होंने कहा, “वंदे मातरम केवल एक गीत नहीं, वरन राष्ट्र की आत्मा है. स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यह गीत देशवासियों में राष्ट्रीय चेतना जागृत करने का प्रमुख माध्यम बना.” प्रो. त्यागी ने खुलासा किया कि शहीद-ए-आज़म भगत सिंह मेरठ आगमन पर कॉलेज के ओडोनिल हॉस्टल में ठहरते थे. उन्होंने मेरठ कॉलेज की स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका पर चर्चा करते हुए बताया कि 1943 में कॉलेज की छात्रा हीरा रस्तोगी ने भवन पर तिरंगा फहराकर ब्रिटिश हुकूमत को चुनौती दी थी, जिसके बाद पुलिस कार्रवाई में वे शहीद हो गईं.
प्रो. त्यागी ने चटगांव शस्त्रागार कांड का उदाहरण देते हुए कहा कि ‘वंदे मातरम’ के नारे ने मास्टर सूर्य सेन और प्रीतिलता वाडेकर जैसे असंख्य युवाओं को आंदोलन से जोड़ा.
कार्यक्रम का समापन सभी उपस्थितों द्वारा ‘वंदे मातरम’ के साम0 सामूहिक गायन से हुआ. राष्ट्रभावना से ओतप्रोत यह आयोजन देशभक्ति की भावना से परिपूर्ण रहा. संचालन डॉ. विनय कुमार आर्य ने किया.
यह आयोजन मेरठ कॉलेज की गौरवशाली परंपरा को जीवंत करता रहा, जहां स्वतंत्रता सेनानियों की यादें आज भी प्रेरणा देती हैं.
Source: News Agencies
