रतन टाटा के करीबी मेहली मिस्त्री बाहर: टाटा ट्रस्ट्स में बड़ा बदलाव, बोर्ड में गहराया मतभेद

By: The Trek News Desk

टाटा समूह के इतिहास में एक और महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ गया है. रतन टाटा के विश्वस्त सहयोगी मेहली मिस्त्री को टाटा ट्रस्ट्स से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है. सूत्रों के अनुसार, सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट के बोर्ड में उनके पुनर्नियुक्ति प्रस्ताव को छह में से तीन ट्रस्टी ने खारिज कर दिया.

विरोध करने वालों में टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा, टीवीएस समूह के चेयरमैन वेणु श्रीनिवासन, और पूर्व रक्षा सचिव विजय सिंह शामिल थे. इस फैसले के साथ ही मेहली मिस्त्री का देश के दो सबसे प्रभावशाली परोपकारी संस्थानों से औपचारिक जुड़ाव समाप्त हो गया है.

ट्रस्ट्स में विभाजन की झलक

ट्रस्ट्स में यह मतभेद आंतरिक ध्रुवीकरण का संकेत दे रहा है. जहां एक ओर नोएल टाटा का गुट संस्थागत अनुशासन और प्रशासनिक एकरूपता पर ज़ोर दे रहा है, वहीं मिस्त्री का गुट रतन टाटा की परंपरा, “सहमति से निर्णय लेने” को बनाए रखने का पक्षधर माना जा रहा है.

मेहली मिस्त्री, जिन्हें 2022 में ट्रस्टी के रूप में शामिल किया गया था, उनका कार्यकाल 28 अक्टूबर 2025 को समाप्त हो रहा था. अब, पुनर्नियुक्ति न होने से यह स्पष्ट है कि ट्रस्ट्स में नोएल टाटा और रतन टाटा खेमे के बीच दरारें गहरी हो चुकी हैं.

किसने दिया समर्थन, किसने किया विरोध

  • सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट में दरियस खंबाटा और प्रमित झावेरी ने मिस्त्री के पक्ष में मतदान किया.
  • सर रतन टाटा ट्रस्ट में जहांगीर एच.सी. जहांगीर और दरियस खंबाटा ने समर्थन दिया.
  • वहीं, नोएल टाटा, वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह ने विरोध जताया, जिससे बहुमत मिस्त्री के खिलाफ गया.

यह विभाजित मत अब ट्रस्ट्स के नेतृत्व में गहरे मतभेद का प्रतीक बन गया है.

सहमति की परंपरा से टकराव का दौर

रतन टाटा के समय में ट्रस्ट्स में कभी मतदान नहीं होता था. सभी निर्णय सर्वसम्मति (consensus) से लिए जाते थे. लेकिन हाल के महीनों में, इस परंपरा की जगह औपचारिक वोटिंग और ध्रुवीकृत निर्णयों ने ले ली है.

हाल ही में मिस्त्री और उनके समर्थक ट्रस्टियों, प्रमित झावेरी, जहांगीर जहांगीर, और दरियस खंबाटा ने वेणु श्रीनिवासन की आजीवन नियुक्ति का समर्थन किया था, लेकिन एक शर्त के साथ, जो थी कि “भविष्य में सभी पुनर्नियुक्तियाँ सर्वसम्मति से हों; अन्यथा हमारी स्वीकृति स्वतः रद्द मानी जाएगी.”

हालांकि, नोएल टाटा, विजय सिंह और वेणु श्रीनिवासन ने इस शर्त को अनदेखा कर दिया, जिसके बाद मतभेद खुलकर सामने आ गए.

सत्ता संतुलन और ट्रस्ट्स की ताकत

टाटा ट्रस्ट्स, टाटा सन्स में 66 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ समूह की सबसे बड़ी शेयरधारक इकाई है, यानी इन्हीं के पास टाटा समूह के भविष्य को दिशा देने की सबसे अधिक शक्ति है.

नोएल टाटा को रतन टाटा के निधन (9 अक्टूबर 2024) के बाद 11 अक्टूबर 2024 को चेयरमैन चुना गया था. उस समय मिस्त्री ने भी उनके नाम का समर्थन किया था, लेकिन एक वर्ष बाद अब वही संबंध दरार में बदल गया है.

तनाव की जड़ – विजय सिंह की पुनर्नियुक्ति

मतभेद की शुरुआत पिछले महीने हुई जब मेहली मिस्त्री के नेतृत्व वाले समूह ने विजय सिंह की टाटा सन्स बोर्ड में पुनर्नियुक्ति का विरोध किया. परिणामस्वरूप, बोर्ड में 3-4 का विभाजन हुआ, जो टाटा ट्रस्ट्स के इतिहास में दुर्लभ है.
विजय सिंह ने सितंबर 2025 के दूसरे सप्ताह में इस्तीफा दे दिया. अब सिंह, राल्फ स्पेथ, अजय पिरामल, और लियो पुरी के बाहर होने के बाद टाटा सन्स बोर्ड में चार सीटें खाली हैं.

ट्रस्ट्स के अंदर अब दो गुट स्पष्ट रूप से बन चुके हैं, एक नोएल टाटा गुट, जो संस्थागत स्थिरता पर केंद्रित है, वहीं, दूसरा मिस्त्री गुट, जो रतन टाटा की विरासत और पारदर्शी चयन प्रक्रिया का प्रतिनिधित्व करता है.

टाटा विरासत की कसौटी

यह पहला अवसर है जब टाटा ट्रस्ट्स के भीतर असहमति इतनी सार्वजनिक रूप से सामने आई है.
कभी “विश्वास, परोपकार और एकता” का प्रतीक रहा यह संस्थान अब एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुका है, जहां सहमति की जगह रणनीति ने ले ली है.

Source: News Agencies

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