नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने ग्रेट निकोबार मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना को दी मंज़ूरी

By: The Trek News Desk

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सोमवार (16 फरवरी, 2026) को ग्रेट निकोबार द्वीप पर प्रस्तावित मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना को हरी झंडी दे दी. पर्यावरणीय स्वीकृतियों को चुनौती देने वाली याचिकाओं का निपटारा करते हुए अधिकरण ने कहा कि परियोजना के “रणनीतिक महत्व” को देखते हुए हस्तक्षेप करने का कोई ठोस आधार नहीं बनता.

करीब ₹92,000 करोड़ की इस महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत एक ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, आधुनिक टाउनशिप और विद्युत संयंत्र विकसित किए जाने का प्रस्ताव है. यह परियोजना 160 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैली होगी, जिसमें लगभग 130 वर्ग किलोमीटर वन भूमि शामिल है. यह इलाका निकोबारी और शोम्पेन जनजातियों का पारंपरिक निवास क्षेत्र है. शोम्पेन समुदाय को विशेष रूप से संवेदनशील जनजातीय समूह (PVTG) की श्रेणी में रखा गया है.

पर्यावरणीय मंज़ूरी को लेकर दायर याचिकाओं पर एनजीटी में सुनवाई हुई, जबकि वन स्वीकृति से जुड़ा मामला कोलकाता हाई कोर्ट में लंबित है. उच्च न्यायालय ने इस प्रकरण को 30 मार्च से शुरू होने वाले सप्ताह में अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है.

इससे पहले अक्टूबर 2025 में केंद्र सरकार ने एनजीटी के समक्ष परियोजना का बचाव करते हुए कहा था कि विकास कार्यों के साथ-साथ अगले 30 वर्षों तक संरक्षण और निगरानी कार्यक्रम चलाए जाएंगे. सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने दलील दी थी कि इस परियोजना के लिए श्रेष्ठ वैज्ञानिक संसाधनों को जोड़ा गया है, जो अनुसंधान, शमन उपायों और दीर्घकालिक पर्यावरणीय निगरानी में मार्गदर्शन देंगे. उन्होंने इसे “राष्ट्रीय संपत्ति” करार दिया था.

हालांकि, इस परियोजना को लेकर विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों ने गंभीर चिंता भी जताई है. वर्ष 2025 में 70 से अधिक विद्वानों, पूर्व नौकरशाहों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पर्यावरण विशेषज्ञों ने एक खुला पत्र लिखकर पर्यावरण मंत्री से अपील की थी कि वे राजनीतिक पहलुओं से ऊपर उठकर परियोजना के संभावित ‘गंभीर और अपूरणीय’ पर्यावरणीय प्रभावों पर विचार करें.

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, लिटिल और ग्रेट निकोबार के जनजातीय परिषद के कुछ सदस्यों ने आरोप लगाया है कि जिला प्रशासन की ओर से उन्हें पैतृक भूमि छोड़ने के लिए दबाव डाला गया. परियोजना के तहत गलाथिया बे, पेम्माया बे और नंजप्पा बे जैसे क्षेत्रों में वन भूमि का उपयोग प्रस्तावित है, जहां 2004 की सुनामी से पहले से ही स्थानीय निकोबारी समुदाय निवास करता रहा है.

ग्रेट निकोबार परियोजना को देश की सामरिक और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन पर्यावरण और जनजातीय अधिकारों को लेकर उठ रहे सवालों ने इसे राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया है.

Source: News Agencies

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